
गदरपुर (उधमसिंह नगर)।
उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों भाजपा की अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ रही है। मामला तब और गरमा गया जब भाजपा सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं मौजूदा विधायक अरविंद पाण्डे को तहसील प्रशासन गदरपुर की ओर से सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का नोटिस जारी कर दिया गया।
यह नोटिस उत्तराखंड उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेश के अनुपालन का हवाला देते हुए जारी किया गया है, जिसमें ग्राम गुलरभोज स्थित सरकारी भूमि (खाता संख्या 64, खसरा संख्या 1271, रकबा 0.158 हेक्टेयर) पर पक्का निर्माण कर अतिक्रमण किए जाने की बात कही गई है। प्रशासन ने 15 दिन के भीतर स्वयं अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं, अन्यथा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
कानूनी कार्रवाई या राजनीतिक संदेश?
हालांकि यह कार्रवाई कागजों में न्यायालय के आदेशों के तहत बताई जा रही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी टाइमिंग और मंशा को लेकर तीखी चर्चा शुरू हो गई है। वजह साफ है
पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद पाण्डे बीते कुछ समय से अपनी ही पार्टी की सरकार, विशेषकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर, कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक फैसलों और नीतिगत मुद्दों को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह विपक्षी भूमिका आमतौर पर विपक्षी दल निभाते हैं, उसी अंदाज़ में भाजपा के भीतर से ही सरकार को घेरा जा रहा है, वह पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है।
चुनावी साल से पहले बढ़ी बेचैनी
अगले वर्ष उत्तराखंड में होने वाले चुनावों को देखते हुए यह मामला और भी संवेदनशील हो गया है। ऐसे समय में जब भाजपा को संगठनात्मक एकजुटता दिखानी चाहिए, पूर्व मंत्री जैसे वरिष्ठ नेता का खुलेआम सरकार के खिलाफ बोलना और फिर उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई का सामने आना, पार्टी की आपसी कलह को उजागर करता है।
राजनीति के जानकार इसे केवल एक अतिक्रमण मामला नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन और असंतोष का प्रतीक मान रहे हैं। चर्चाएं यह भी हैं कि यह नोटिस कहीं न कहीं राजनीतिक द्वंद और आंतरिक असहमति का नतीजा है।
सरकार की चुप्पी, विपक्ष को मौका
इस पूरे मामले पर अभी तक सरकार या पार्टी नेतृत्व की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल गया है। विपक्ष इसे भाजपा की कथनी-करनी और अंदरूनी अव्यवस्था का उदाहरण बताने में जुट गया है।
आगे क्या?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि
– पूर्व मंत्री इस नोटिस पर क्या रुख अपनाते हैं
– क्या वह इसे अदालत में चुनौती देंगे
– या यह मामला भाजपा के भीतर और बड़ा सियासी संकट खड़ा करेगा
फिलहाल इतना तय है कि अतिक्रमण नोटिस ने उत्तराखंड भाजपा की अंदरूनी राजनीति को खुली बहस में ला खड़ा किया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गर्म होने के पूरे आसार हैं।
