
धामी सरकार के फैसले से भाजपा आमने-सामने: अरविंद पांडे को नोटिस, डैमेज कंट्रोल में उतरेंगे त्रिवेंद्र–बलूनी या तैयार होगा बीजेपी के भीतर नया मोर्चा
उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर यह साफ़ होने लगा है कि सत्ता में एकजुट दिखने वाली भारतीय जनता पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान भाजपा विधायक अरविंद पांडे को प्रशासन द्वारा 15 दिन के भीतर अतिक्रमण हटाने का नोटिस दिए जाने के बाद यह मामला केवल कानूनी या प्रशासनिक दायरे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर सत्ता, संगठन और नेतृत्व के बीच चल रही खींचतान की ओर इशारा कर रहा है।
अरविंद पांडे कोई साधारण विधायक नहीं हैं। वे लंबे समय से धामी सरकार की कार्यशैली, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक निष्क्रियता पर खुलकर सवाल उठाते रहे हैं। कई बार उनके बयान ऐसे रहे हैं, जिनसे यह संदेश गया कि सरकार के भीतर असहमति केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं है। चुनाव से पहले उनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई को राजनीतिक हलकों में संयोग से अधिक, संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
यही कारण है कि नोटिस के बाद भाजपा के भीतर हलचल तेज हो गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम है कि क्या यह सख्ती सिर्फ प्रशासनिक है या फिर एक मुखर नेता को नियंत्रित करने की कोशिश। सवाल इसलिए भी गहरे हैं क्योंकि जिस समय पार्टी चुनावी मोड में है, उसी समय ऐसे फैसले असहज राजनीतिक संदेश देते हैं।
इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत तथा गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी का अरविंद पांडे के गदरपुर स्थित आवास पर पहुंचना बेहद अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में इसे भाजपा का डैमेज कंट्रोल अभियान माना जा रहा है। माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि यह असंतोष सार्वजनिक टकराव में बदले और संगठनात्मक दरारें खुलकर सामने आएं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने एक और बहस को जन्म दे दिया है। तराई क्षेत्र से आने वाले नेताओं में पहले से ही यह भावना रही है कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी अनदेखी हो रही है। अरविंद पांडे का मामला अब उस असंतोष का प्रतीक बनता नजर आ रहा है। यदि यह भावना संगठित होती है, तो भाजपा के भीतर एक नया आंतरिक मोर्चा खड़ा होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे परिदृश्य में विपक्षी कांग्रेस की निगाहें भी टिकी हुई हैं। भाजपा की यह अंदरूनी खींचतान कांग्रेस के लिए राजनीतिक संजीवनी साबित हो सकती है। कांग्रेस पहले ही सरकार को कानून व्यवस्था, बेरोजगारी और प्रशासनिक विफलताओं को लेकर घेरती रही है, और अब उसे यह कहने का मौका मिल सकता है कि भाजपा अपनी आंतरिक समस्याओं से ही नहीं उबर पा रही है।
त्रिवेंद्र सिंह रावत की भूमिका इस घटनाक्रम को और संवेदनशील बना देती है। वे पहले ही धामी सरकार और प्रशासन के खिलाफ अवैध खनन जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर संसद में आवाज उठा चुके हैं। इससे यह संदेश गया था कि भाजपा के भीतर मतभेद केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुके हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा नेतृत्व समय रहते इस स्थिति को संभाल पाएगा या फिर यह मामला चुनाव से पहले पार्टी के भीतर खुली सियासी चुनौती का रूप ले लेगा। अरविंद पांडे को मिला नोटिस फिलहाल एक प्रशासनिक आदेश है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
