हरिद्वार।

 

मातृ सदन, जगजीतपुर में 28 जनवरी 2026 को हुई हिंसक घटना को लेकर सत्र न्यायालय का आदेश अब केवल एक जमानत आदेश नहीं रह गया है, बल्कि यह उस पूरे घटनाक्रम पर रोशनी डालता है जिसमें प्रशासनिक पैमाइश, भूमि विवाद और आपसी टकराव के बीच एक संत को आरोपी बनाने की कोशिश की गई।

 

अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि यह घटना किसी अचानक उभरे विवाद का परिणाम नहीं थी, बल्कि सरकारी ज़मीन की पैमाइश के लिए पहले से तय प्रक्रिया के तहत दोनों पक्षों को बुलाया गया था। हरिद्वार विकास प्राधिकरण द्वारा जांच के लिए दोनों पक्षों को आमंत्रित किया गया और मौके पर हल्का लेखपाल को पैमाइश के लिए भेजा गया। यही वह क्षण था जब वर्षों से चला आ रहा भूमि विवाद खुले टकराव में बदल गया।

 

 

पैमाइश के दौरान माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि पहले कहासुनी और फिर मारपीट शुरू हो गई। इसी अफरातफरी में गोली चलने की घटना सामने आई, जिसमें कुछ लोग घायल हुए। लेकिन अदालत ने यह भी दर्ज किया कि इस गोलीकांड के संबंध में मुख्य अभियुक्त ने स्वयं थाने में यह कहा कि फायरिंग आत्मरक्षा में हुई। यह तथ्य पूरे प्रकरण की दिशा ही बदल देता है।

 

 

इसी घटनाक्रम में स्वामी ब्रह्मचारी सुधानंद जी की उपस्थिति को आधार बनाकर उन्हें भी मामले में घसीटने का प्रयास किया गया। जबकि कोर्ट के सामने यह स्पष्ट हुआ कि स्वामी जी को भी प्रशासन द्वारा फोन कर पैमाइश के लिए बुलाया गया था। वे घटनास्थल पर पहुंचे अवश्य, लेकिन वे अपनी गाड़ी से बाहर नहीं निकले और न ही किसी प्रकार की हिंसक गतिविधि में उनकी सक्रिय भूमिका पाई गई।

 

 

न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि स्वामी ब्रह्मचारी सुधानंद जी लंबे समय से सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़े, अवैध प्लॉटिंग और भू-माफियाओं के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। वे इस मामले से जुड़े एक जनहित याचिका की पैरवी भी कर रहे थे। ऐसे में उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा स्वाभाविक रूप से संदेह के घेरे में आता है।

 

 

अदालत के आदेश में यह बात विशेष रूप से उभरकर आती है कि पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक बुलावे, पैमाइश की प्रक्रिया और मौके पर उत्पन्न तनाव की बड़ी भूमिका रही। प्रकरण में स्वामी जी की कोई सीधी संलिप्तता न होना, कोई बरामदगी न होना और मुख्य आरोपी द्वारा आत्मरक्षा का दावा किया जाना, इन सभी तथ्यों ने न्यायालय को यह मानने के लिए प्रेरित किया कि स्वामी ब्रह्मचारी सुधानंद जी को गिरफ्तार करना न्यायोचित नहीं होगा।

 

 

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए सत्र न्यायालय ने स्वामी ब्रह्मचारी सुधानंद जी को अग्रिम जमानत का संरक्षण प्रदान किया। अदालत ने माना कि बिना ठोस साक्ष्य के एक संत, अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता को आपराधिक मुकदमे में फँसाना न केवल कानून की भावना के विरुद्ध है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

 

 

यह मामला अब केवल मातृ सदन में हुई एक हिंसक घटना तक सीमित नहीं रहा है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है जिसमें सरकारी ज़मीन की पैमाइश जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासन स्वयं लोगों को बुलाता है और बाद में घटित घटना की जिम्मेदारी उन्हीं में से कुछ पर डाल दी जाती है। न्यायालय का यह आदेश फिलहाल स्वामी ब्रह्मचारी सुधानंद जी के लिए राहत लेकर आया है, लेकिन साथ ही इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग को और मजबूत करता है

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