हरिद्वार।

 

उत्तराखंड में कानून का राज है या भू-माफियाओं का—यह सवाल अब केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा। ग्राम नूरपुर पंजनहेड़ी और जियापोता में कृषि एवं बाग भूमि पर अवैध कॉलोनियों के निर्माण से जुड़ा मामला अब प्रशासनिक संरक्षण, विकास प्राधिकरण की मिलीभगत और सरकारी मशीनरी की विफलता का प्रतीक बन चुका है।

 

 

दिनांक 28 जनवरी 2026 को सरकारी पैमाइश के दौरान हुई हिंसक घटना के बाद सामने आए डिजिटल साक्ष्यों ने प्रारंभिक आधिकारिक कहानी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मातृ सदन का कहना है कि यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा थी, जिसमें हथियारों से लैस माफिया प्रशासन की मौजूदगी में मौके पर मौजूद थे।

 

 

मातृ सदन द्वारा 14 जनवरी 2026 को जिलाधिकारी हरिद्वार और हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण को भेजे गए पत्र में खसरा संख्या 154 एवं 158 में अवैध प्लाटिंग की स्पष्ट जानकारी दी गई थी।

 

इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा न तो समय पर रिपोर्ट दी गई और न ही ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई की गई।

यह पूरा प्रकरण माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय (19 जून 2018) और माननीय सर्वोच्च न्यायालय (30 अप्रैल 2024) के स्पष्ट आदेशों की खुली अवहेलना है, जिनमें कृषि व बाग भूमि के गैर-कृषि उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बाद भी हरिद्वार क्षेत्र में सैकड़ों बीघा भूमि पर बागों का कटान कर अवैध कॉलोनियां विकसित कर दी गईं।

 

आरोप है कि तहसील प्रशासन से लेकर विकास प्राधिकरण और शासन स्तर तक नियमों को जानबूझकर दरकिनार किया गया। विकास प्राधिकरण की बोर्ड बैठकों में आपत्तियों को अनदेखा कर अवैध स्वीकृतियां दी गईं, जबकि शिकायतकर्ता वर्षों से दस्तावेज़ी प्रमाणों के साथ आवाज़ उठाते रहे।

 

 

28 जनवरी की घटना के दौरान प्रशासनिक वाहनों की मौजूदगी, पैमाइश के नाम पर दबाव और बाद में रिपोर्ट को मनमाने ढंग से गढ़ने की कोशिश—ये सभी तथ्य सिस्टम की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। मातृ सदन का कहना है कि यदि पीड़ित पक्ष के पास लाइसेंसी हथियार न होता, तो बड़ी जनहानि से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

 

मातृ सदन ने पूरे मामले में स्वतंत्र एसआईटी जांच, दोषी अधिकारियों और भू-माफियाओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई तथा संबंधित संपत्तियों की जांच की मांग दोहराई है।

 

 

इधर, मातृ सदन के संत ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद का अनशन पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है, लेकिन प्रशासन की निष्क्रियता यह संकेत दे रही है कि जनहित की आवाज़ को दबाने की कोशिशें जारी हैं।

यह मामला अब केवल भूमि घोटाले का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था, न्याय प्रणाली और लोकतांत्रिक मूल्यों की विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा बन चुका है।

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