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किसानों पर संकट के बादल: शुरू होने वाला है अल नीनो का खतरनाक दौर, मॉनसून और खेती पर बड़ा खतरा

नई दिल्ली। देशभर के किसानों के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि आने वाले कुछ हफ्तों में अल नीनो का नया और खतरनाक दौर शुरू हो सकता है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसका असर साल 2026 के बाकी महीनों में और अधिक देखने को मिल सकता है, जिससे भारत सहित कई देशों में भीषण गर्मी, कमजोर मॉनसून और जल संकट जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अल नीनो का सीधा असर खेती और किसानों पर पड़ता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार यदि अल नीनो मजबूत होता है तो दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ सकता है। इससे धान, मक्का, दाल, गन्ना और सब्जियों जैसी खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनने की संभावना भी जताई जा रही है। वहीं दूसरी ओर अत्यधिक गर्मी और हीटवेव की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पेयजल संकट, बिजली की मांग और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

पहाड़ी राज्यों के लिए भी यह स्थिति चिंाजनक मानी जा रही है। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में मौसम का असामान्य व्यवहार देखने को मिल सकता है। कहीं अचानक भारी बारिश, बादल फटना और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं, तो कहीं लंबे समय तक सूखे की स्थिति बन सकती है। इसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय पर पड़ना तय माना जा रहा है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सरकारों ने तैयारी नहीं की तो आने वाले महीनों में किसानों को बीज, सिंचाई, फसल सुरक्षा और उत्पादन लागत से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। बढ़ती लागत और मौसम की अनिश्चितता पहले ही किसानों की चिंता बढ़ा रही है।

केंद्र सरकार और मौसम विभाग लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं। राज्यों को भी संभावित मौसम संकट और आपदा प्रबंधन को लेकर सतर्क रहने के निर्देश दिए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में मॉनसून की स्थिति और अल नीनो की तीव्रता पर पूरे देश की नजर रहेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अल नीनो अब केवल एक मौसमी घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह खेती, अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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