माल्टा–मनीला–भिकियासैंण में पेड़ पर फल सड़ रहे;किसान मंच ने उठाए सरकार की कार्यशैली और योजनाओं पर सवाल
सरकारी योजनाओं, रिपोर्टों और दस्तावेज़ों के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ ज़मीन पर दिखाई नहीं देता। घोषणाओं और प्रचार की चमक के बीच पहाड़ी क्षेत्रों की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। योजनाएं अक्सर काग़ज़ों तक सीमित रह जाती हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर न तो ठोस क्रियान्वयन होता है और न ही किसानों को उसका प्रत्यक्ष लाभ मिल पाता है। इस फिजूलखर्ची और धन के दुरुपयोग को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में माल्टा, नींबू और संतरे जैसे फल बड़ी मात्रा में उत्पादन के बावजूद पेड़ों पर ही सड़ रहे हैं। माल्टा–मनीला–भिकियासैंण क्षेत्र में यह समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। समय पर खरीद, उचित मूल्य और सस्ती ढुलाई व्यवस्था न होने के कारण किसानों की मेहनत बेकार जा रही है। यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट पूरे कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है।
इस मुद्दे को लेकर किसान मंच ने खुलकर आवाज़ बुलंद की है। किसान मंच का कहना है कि विकासखंडों सल्ट सहित आसपास के क्षेत्रों में माल्टा, नींबू और नारंगी की पैदावार अच्छी हो रही है, लेकिन ढुलाई का खर्च इतना अधिक है कि किसान लागत तक नहीं निकाल पा रहा। सरकार जहां फलों की खरीद का रेट बेहद कम तय कर रही है, वहीं गांव से सड़क तक फल पहुंचाने में ही किसानों को प्रति किलो करीब 12 रुपये तक खर्च उठाना पड़ रहा है। ऐसे में किसान को फल का सही दाम मिलना एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
किसान मंच की प्रदेश प्रवक्ता कुसुम लता बौड़ाई ने इस संदर्भ में उद्यान निदेशक से मुलाकात कर किसानों की समस्याएं उनके सामने रखीं। मुलाकात के बाद उद्यान निदेशक की ओर से अवगत कराया गया कि अल्मोड़ा जनपद में सी-ग्रेड माल्टा का समर्थन मूल्य 7 रुपये प्रति किलो से बढ़ाकर 10 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है। हालांकि किसान मंच का कहना है कि यह बढ़ोतरी भी किसानों के लिए पर्याप्त नहीं है।
प्रदेश प्रवक्ता कुसुम लता बौड़ाई ने स्पष्ट कहा कि जब गांव से सड़क तक ढुलाई का खर्च ही 12 रुपये प्रति किलो आ रहा है, तो 10 रुपये का मूल्य तय करना किसानों के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि सरकार को केवल रेट बढ़ाने तक सीमित न रहकर स्थायी समाधान की दिशा में काम करना चाहिए। इसके लिए गांवों के भीतर ही जगह-जगह प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जानी चाहिए, ताकि माल्टा और अन्य फलों का उपयोग स्थानीय स्तर पर जूस, जैम और अन्य उत्पादों के रूप में किया जा सके।
उन्होंने यह भी कहा कि स्वयं सहायता समूहों को इस प्रक्रिया से जोड़ा जाए, जिससे गांव में ही रोजगार पैदा हो और किसान केवल उत्पादक नहीं बल्कि व्यापारी भी बन सके। जब तक योजनाओं की निगरानी, पारदर्शिता और ज़मीनी क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक विकास केवल फाइलों और रिपोर्टों तक ही सीमित रहेगा।
किसान मंच ने सरकार से मांग की है कि कागज़ी योजनाओं और प्रचार पर होने वाले खर्च को कम कर वास्तविक ज़मीनी ढांचे—खरीद केंद्र, प्रोसेसिंग यूनिट और सस्ती ढुलाई व्यवस्था—पर निवेश किया जाए, ताकि माल्टा–मनीला–भिकियासैंण क्षेत्र के किसानों को उनकी मेहनत का पूरा लाभ मिल सके और पहाड़ों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सके।

