देहरादून: बढ़ती महंगाई और घरेलू गैस (LPG) के लगातार बढ़ते दामों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। इसी बीच कई सामाजिक संगठनों और ग्रामीण प्रतिनिधियों ने मांग उठाई है कि यदि सरकार एलपीजी सिलेंडर की कीमतों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है तो कम से कम जंगलों में गिरी सूखी लकड़ी पर स्थानीय ग्रामीणों को अधिकार दिया जाए, ताकि वे अपने दैनिक जीवन के लिए ईंधन की व्यवस्था कर सकें।

ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में आज भी बड़ी संख्या में परिवार खाना बनाने के लिए लकड़ी पर निर्भर हैं। लेकिन वन कानूनों और सख्त नियमों के कारण जंगलों से लकड़ी लाना आसान नहीं रह गया है। कई बार ग्रामीणों को सूखी या गिरी हुई लकड़ी लेने पर भी रोक-टोक का सामना करना पड़ता है।

LPG के बढ़ते दाम बने परेशानी का कारण

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि एलपीजी सिलेंडर की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों का बजट बिगड़ रहा है। कई परिवारों के लिए हर महीने गैस सिलेंडर भरवाना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में लोग फिर से पारंपरिक ईंधन की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं।

जंगल की गिरी लकड़ी से मिल सकता है समाधान

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि जंगलों में बड़ी मात्रा में सूखी और गिरी हुई लकड़ी पड़ी रहती है, जो धीरे-धीरे सड़कर नष्ट हो जाती है या कई बार जंगल की आग का कारण भी बनती है। यदि सरकार स्थानीय ग्रामीणों को इस गिरी हुई लकड़ी को इकट्ठा करने की अनुमति दे दे, तो इससे दो फायदे होंगे—

ग्रामीणों को सस्ता और सुलभ ईंधन मिलेगा।

जंगलों में सूखी लकड़ी कम होने से आग लगने की घटनाओं में भी कमी आ सकती है।

सरकार से नीति बनाने की मांग

ग्रामीण संगठनों ने सरकार से मांग की है कि एक स्पष्ट नीति बनाई जाए, जिसके तहत गांवों के आसपास के जंगलों में गिरी हुई लकड़ी को ग्रामीणों द्वारा सीमित मात्रा में एकत्र करने की अनुमति दी जाए। इससे ग्रामीणों की आजीविका और पर्यावरण दोनों का संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगल और गांव का रिश्ता सदियों पुराना है। यदि सरकार सही नियम बनाकर ग्रामीणों को सीमित अधिकार दे, तो इससे न तो जंगलों को नुकसान होगा और न ही लोगों को ईंधन के लिए परेशान होना पड़ेगा।

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