देहरादून। राजधानी देहरादून में राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिग्रहित भूमि के मुआवज़े को लेकर एक सेना के जवान का मामला सुर्खियों में आ गया है। जवान ने आरोप लगाया है कि उसकी पुश्तैनी जमीन का अधिग्रहण तो कर लिया गया, लेकिन मुआवज़े की राशि किसी अन्य व्यक्ति के नाम जारी कर दी गई।

मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक तंत्र में हलचल मच गई है। संबंधित विभाग ने जांच के आदेश देने की बात कही है, वहीं जवान ने न्याय न मिलने पर उच्च स्तर तक शिकायत ले जाने की चेतावनी दी है।

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, देहरादून के ग्रामीण क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग विस्तार परियोजना के तहत कई भूखंडों का अधिग्रहण किया गया था। सेना में तैनात जवान की जमीन भी इसी प्रक्रिया में शामिल थी। जवान का कहना है कि वह लंबे समय से ड्यूटी पर बाहर तैनात था और इसी दौरान अधिग्रहण व मुआवज़े की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।

जब वह छुट्टी पर घर लौटा तो उसे पता चला कि उसकी जमीन के बदले मिलने वाली लाखों रुपये की मुआवज़ा राशि किसी अन्य व्यक्ति के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी गई है।

जवान ने लगाए गंभीर आरोप

जवान ने आरोप लगाया है कि राजस्व अभिलेखों में कथित रूप से हेरफेर कर मुआवज़ा दूसरे व्यक्ति को दिलाया गया। उसका कहना है कि सभी वैध दस्तावेज उसके पास मौजूद हैं और भूमि पर उसका ही स्वामित्व दर्ज है।

उसने जिला प्रशासन से निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

प्रशासन का पक्ष

जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने बताया कि मामला संज्ञान में आया है और संबंधित फाइलों की जांच की जा रही है। यदि रिकॉर्ड में गड़बड़ी या धोखाधड़ी पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

अधिकारियों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जाती है, लेकिन यदि किसी स्तर पर त्रुटि हुई है तो उसे सुधारा जाएगा।

स्थानीय लोगों में आक्रोश

मामले के सामने आने के बाद क्षेत्र के लोगों में भी नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि एक सैनिक के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम नागरिकों की स्थिति क्या होगी। कई सामाजिक संगठनों ने भी जवान को न्याय दिलाने की मांग की है।

आगे क्या?

जवान ने जिलाधिकारी कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई है और राजस्व रिकॉर्ड की पुनः जांच की मांग की है। संभावना जताई जा रही है कि मामला उच्चाधिकारियों या न्यायालय तक भी जा सकता है।

यह मामला न केवल भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की भी परीक्षा है। अब सभी की नजरें जांच रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं।

error: Content is protected !!