जनपद में अंतरराष्ट्रीय निर्यात को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे फिलहाल कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। बीते तीन वर्षों में निर्यात के लिए केवल चार इकाइयों का पंजीकरण होना इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं।
सरकार और उद्योग विभाग की ओर से समय-समय पर निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं की घोषणा की गई, उद्यमियों को प्रशिक्षण देने और वैश्विक बाजार से जोड़ने की बात कही गई, लेकिन आंकड़े तस्वीर कुछ और ही बयां कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद और लघु उद्योगों की पर्याप्त संभावनाएं होने के बावजूद उद्यमी निर्यात के क्षेत्र में आगे आने से हिचक रहे हैं।
उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि जटिल प्रक्रियाएं, पर्याप्त मार्गदर्शन का अभाव, वित्तीय जोखिम और अंतरराष्ट्रीय मानकों की जानकारी न होना प्रमुख कारण हैं। वहीं कई छोटे उद्यमियों का आरोप है कि योजनाओं की जानकारी गांव और कस्बों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्यात को वास्तव में बढ़ावा देना है तो एकल खिड़की प्रणाली को सरल बनाना होगा, प्रशिक्षण शिविरों को जमीनी स्तर तक ले जाना होगा और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान देना होगा।
फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिले की भागीदारी बेहद सीमित है और निर्यात का सपना अब भी योजनाओं की फाइलों में कैद नजर आ रहा है।
