रिपोर्ट किसानपुत्र कार्तिक उपाध्याय
उत्तराखंड कोई सामान्य राज्य नहीं है।
यह राज्य सत्ता की मेज़ पर बैठकर नहीं, बल्कि सड़कों पर बहते खून और 42 शहीदों के बलिदान से बना है। लेकिन विडंबना यह है कि राज्य बने 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड आज उन्हीं सवालों पर आंदोलन करता दिखाई देता है—
भू-कानून, मूल निवास, रोजगार, शिक्षा, पलायन और पहाड़ी अस्मिता।
राज्य निर्माण के समय जनता के सामने एक वैकल्पिक राजनीति का सपना रखा गया था, लेकिन जनता ने बहुत पहले ही तय कर लिया कि उत्तराखंड क्रांति दल जैसे दल उस सपने को पूरा करने में असफल रहे। आज हालत यह है कि UKD का वोट बैंक नोट से भी नोटा से छोटा हो चुका है।
ऐसे राजनीतिक शून्य में एक नाम उभरा—
बॉबी पंवार
बॉबी पंवार ने वो किया, जो बीते दो दशकों में कोई नहीं कर सका—
उन्होंने युवाओं को सड़कों पर उतारा,
उन्होंने परीक्षा घोटालों को नंगा किया,
और उन्होंने यह साबित किया कि सत्ता से बाहर रहकर भी सरकार को हिलाया जा सकता है।
*पहली लोकसभा और जनता का संकेत*
पहली ही लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उतरकर बॉबी पंवार को जो अंधाधुंध जनसमर्थन मिला, वह केवल वोट नहीं था—
वह एक राजनीतिक चेतावनी थी कि उत्तराखंड अब पुराने चेहरों से ऊब चुका है।
खासतौर पर परीक्षार्थी युवा, जो अब तक किसी दल का कोर वोट नहीं थे, बॉबी पंवार की सबसे बड़ी ताकत बने।
यहीं से राष्ट्रीय दलों की नींद उड़नी शुरू हुई।
स्वाभिमान आंदोलन और नया मोर्चा
जब प्रेमचंद अग्रवाल जैसे मंत्री खुले मंचों से पहाड़ी अस्मिता को चुनौती दे रहे थे, उसी दौर में बॉबी पंवार ने सभी दलों से दूरी बनाकर
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा
का गठन किया।
यह कोई पार्टी नहीं, बल्कि एक आंदोलनात्मक मंच था—
जहां क्षेत्रीय दल, सामाजिक संगठन, शिक्षक, बेरोजगार युवा और ज़मीनी कार्यकर्ता जुड़े।
लेकिन यहीं से एक नई समस्या जन्म लेने लगी—आंदोलन और चुनावी राजनीति का टकराव।
*महत्वाकांक्षा बनाम आंदोलन*
सामाजिक आंदोलनों का इतिहास गवाह है—
जब आंदोलन चुनावी शक्ल लेने लगता है, तब अहम और महत्वाकांक्षा टकराने लगती है।
धीरे-धीरे यह चर्चा तेज़ हुई कि—
फैसले कुछ लोगों तक सीमित हो रहे हैं
पुराने साथियों को हाशिए पर धकेला जा रहा है
संगठन आंदोलन से ज़्यादा “नेतृत्व केंद्रित” होता जा रहा है
*ऋषिकेश मेयर चुनाव और असली ब्रेकिंग*
ऋषिकेश मेयर चुनाव में
मूल निवास-भू कानून संघर्ष समिति और बॉबी पंवार से जुड़े कार्यकर्ताओं के कारण
दिनेश मास्टरजी को अभूतपूर्व समर्थन मिला।
पूरे प्रदेश में उन्हें एक संघर्षशील चेहरा के रूप में देखा जाने लगा।
और अब आया वो पोस्ट—
जिसने राजनीति में भूचाल ला दिया।
दिनेश मास्टरजी ने सार्वजनिक रूप से लिखा कि—
उन्हें उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा से पदमुक्त किया जाए और वे स्वतंत्र रूप से राज्यहित की लड़ाई लड़ेंगे।
यह कोई साधारण त्यागपत्र नहीं है।
यह एक वर्तमान राजनीतिक दस्तावेज हैं।
*अब असली सवाल*
अब सवाल यह नहीं है कि
दिनेश मास्टरजी क्यों अलग हुए?
सवाल यह है कि—क्या यह आंतरिक लोकतंत्र की कमी का नतीजा है?
या फिर राष्ट्रीय दलों की सुनियोजित घुसपैठ?
क्या उभरते विकल्प को अंदर से कमजोर किया जा रहा है?
पिछले 4 वर्षों में अगर सत्ता से बाहर रहकर किसी ने सरकार से सवाल पूछे हैं, तो कांग्रेस के अलावा यही सामाजिक-क्षेत्रीय चेहरे रहे हैं।
*2027 और सत्ता का गणित*
उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा कड़वा सच—
70 सीटें
बहुमत 36
पहाड़ बनाम तराई का गहरा विभाजन
यही कारण है कि
उत्तराखंड क्रांति दल
जैसे दल सत्ता तक कभी नहीं पहुंच पाए।
अब बड़ा प्रश्न यह है— क्या 2027 का चुनाव फिर सिर्फ
भारतीय जनता पार्टी
और
कांग्रेस
के बीच सिमट जाएगा?
या फिर तीसरा विकल्प बनेगा,
जो सीधे सत्ता में न सही, लेकिन वोट काटकर राजनीतिक संतुलन जरूर बदलेगा?
*बेतालघाट, शीलू और आने वाला तूफान*
बेतालघाट में शीलू द्वारा दिखाई गई भीड़ और उसके बाद दर्ज मुकदमे यह साफ संकेत हैं कि— राज्य में इस बार निर्दलीय, शिक्षक, युवा और महिलाएं बड़ी संख्या में मैदान में उतरने को तैयार हैं।
उत्तराखंड की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर है।
यह केवल बॉबी पंवार या दिनेश मास्टरजी का मामला नहीं है—
यह सवाल है कि—
क्या उत्तराखंड को एक वास्तविक तीसरा विकल्प मिलेगा,
या हर बार की तरह विकल्प को पैदा होने से पहले ही कुचल दिया जाएगा?
2027
सिर्फ चुनाव नहीं होगा—
यह तय करेगा कि उत्तराखंड आंदोलन की धरती रहेगा या सिर्फ सत्ता का मैदान।
