कार्तिक उपाध्याय की कलम से
देहरादून।
उत्तराखंड राज्य को बने 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन राज्य की राजनीति आज भी उन्हीं बुनियादी सवालों के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती है जिनसे मुक्ति के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी। पलायन, बेरोज़गारी, पहाड़ों की उपेक्षा और संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण जैसे मुद्दों पर आज भी आंदोलन जारी हैं, लेकिन इन आंदोलनों का राजनीतिक अनुवाद अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।
राज्य निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाला उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) इन दिनों सोशल मीडिया पर फिर सक्रिय दिखाई दे रहा है। पोस्ट, वीडियो और चर्चाओं में उक्रांद को “राज्य की मूल आवाज़” बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया की यह भीड़ मतदान केंद्र तक पहुंच पाएगी?
अतीत में उक्रांद नेतृत्व द्वारा की गई कुछ राजनीतिक और संगठनात्मक गलतियों के चलते जनता का भरोसा कमजोर हुआ, जिसका असर आज भी दिखाई देता है।
परिणामस्वरूप उत्तराखंड की राजनीति में एक विचित्र स्थिति बनी हुई है—
सड़कों पर क्षेत्रीय दल और आंदोलनकारी संगठन सक्रिय हैं, लेकिन सदन में प्रतिनिधित्व भाजपा और कांग्रेस तक ही सिमटा हुआ है।
क्षेत्रीय दल संघर्ष करते हैं, जनमुद्दे उठाते हैं, पर सत्ता का निर्णय अंततः राष्ट्रीय दलों के पक्ष में जाता है।
इसी बीच नए प्रयोग भी सामने आए हैं। युवा नेता बॉबी पंवार ने स्वाभिमान मोर्चा बनाकर खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग विकल्प के रूप में पेश किया है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार शिव प्रसाद सेमवाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी का गठन किया है। इसके अलावा उत्तराखंड में 50 से अधिक छोटे-बड़े क्षेत्रीय और स्थानीय दल पंजीकृत हैं।
हालांकि समस्या विकल्पों की कमी नहीं, बल्कि एकजुटता की अनुपस्थिति है। राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और आपसी अविश्वास के चलते क्षेत्रीय और आंदोलनकारी ताकतें एक साझा मंच पर नहीं आ पा रही हैं। इस बिखराव का सीधा लाभ भाजपा और कांग्रेस को मिलता रहा है, जो मजबूत संगठनात्मक ढांचे और संसाधनों के साथ सत्ता की दौड़ में आगे रहती हैं।
अब जबकि अगले वर्ष राज्य में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की जनता इस बार निर्दलीय या क्षेत्रीय चेहरों पर भरोसा करेगी, या फिर परंपरागत रूप से भाजपा-कांग्रेस के बीच ही सत्ता का फैसला होगा।
साथ ही यह भी राजनीतिक बहस का विषय है कि क्या कांग्रेस राज्य में वापसी कर पाएगी या भाजपा अपनी पकड़ बनाए रखेगी।
25 वर्षों के अनुभव के बाद उत्तराखंड आज एक राजनीतिक चौराहे पर खड़ा है—
जहां एक ओर आंदोलन हैं, असंतोष है, सवाल हैं;
और दूसरी ओर अब भी एक मजबूत, विश्वसनीय और संगठित क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प की तलाश जारी है।
