हरिद्वार | 02 फ़रवरी 2026

 

 

मातृ सदन, हरिद्वार में ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द जी के अविछिन्न अनशन का आज तीसरा दिन है, लेकिन उत्तराखण्ड का शासन-प्रशासन अब तक न केवल निष्क्रिय बना हुआ है, बल्कि गंभीर आरोपों पर पूरी तरह मौन भी है।

 

सवाल अब सिर्फ एक संत के अनशन का नहीं, बल्कि यह है कि क्या उत्तराखण्ड में कानून का शासन समाप्त हो चुका है और माफिया तंत्र हावी हो गया है?

 

मातृ सदन में आयोजित प्रेस वार्ता में पुलिस, जिला प्रशासन और भू-माफिया गठजोड़ को लेकर ऐसे तथ्य और प्रश्न सामने रखे गए, जिन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मातृ सदन द्वारा पुलिस और प्रशासन से पूछे गए 15 सीधे, तथ्यात्मक सवालों को 48 घंटे से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन एक भी प्रश्न का उत्तर अब तक नहीं दिया गया।

 

मातृ सदन का आरोप है कि उनके एक संत और अन्य निर्दोष लोगों को जघन्य आपराधिक धाराओं में फँसाना एक सुनियोजित षड्यंत्र है।

 

जबकि घटना से जुड़े वीडियो, कॉल रिकॉर्डिंग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं, इसके बावजूद पुलिस चुप्पी साधे बैठी है।

सबसे गंभीर सवाल उस समय को लेकर उठाया गया है जब घटनास्थल पर पटवारी सरकारी रिकॉर्ड लेकर मौजूद था, माफिया खुलेआम हमले की स्थिति में थे, फिर भी पुलिस को तत्काल क्यों नहीं बुलाया गया? कॉल रिकॉर्डिंग में घटनास्थल पर मौजूद होने की बात स्वीकार कर चुके तहसीलदार सचिन कुमार और पटवारी के नाम अब तक FIR में क्यों नहीं जोड़े गए?

 

 

मातृ सदन ने मांग की है कि 27 और 28 जनवरी 2026 तथा उसके बाद की अवधि में स्वामी यतीश्वरानन्द, तहसीलदार सचिन कुमार, अमित चौहान और उसके सहयोगियों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स जब्त कर इस षड्यंत्र का पर्दाफाश किया जाए। आशंका जताई गई है कि ऐसा करने से संतों और अन्य लोगों की हत्या की साजिश का पूरा ताना-बाना सामने आ सकता है।

 

 

प्रेस वार्ता में यह भी आरोप लगाया गया कि कथित घायल सचिन चौहान के कई वीडियो सामने आने के बावजूद, बिना मेडिकल परीक्षण के उसे सीधे हायर सेंटर भेजा गया और पूरा घटनाक्रम पूर्व-नियोजित कहानी की तरह गढ़ा गया।

 

 

मातृ सदन ने अब तक SIT के गठन न होने पर भी सवाल खड़े किए हैं। संस्था का कहना है कि यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि भू-माफिया, अवैध कॉलोनियाँ, सरकारी भूमि पर कब्ज़ा, पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत और संतों के खिलाफ साजिश से जुड़ा एक बड़ा षड्यंत्र है।

 

 

सबसे विस्फोटक आरोप एसएसपी प्रमेन्द्र डोबाल और स्वामी यतीश्वरानन्द से जुड़े भूमि कब्ज़ों को लेकर लगाए गए हैं। मातृ सदन का दावा है कि इनके पास अवैध निर्माणों के फोटो, वीडियो और दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं, जिन पर आज तक कोई जांच नहीं हुई।

गंगा तट पर अवैध कब्ज़ों, HRDA द्वारा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों के विरुद्ध दिए गए अनुमोदनों, और “उषा टाउनशिप” जैसे मामलों को लेकर भी प्रशासन की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।

 

 

अंततः मातृ सदन ने दो टूक सवाल रखा— “उत्तराखण्ड में कानून का शासन चलेगा या माफिया राज?”

और यह भी कि बिना किसी संवैधानिक पद के स्वामी यतीश्वरानन्द द्वारा सरकारी लेटरहेड का प्रयोग और अधिकारियों को निर्देश देना किसके संरक्षण में हो रहा है?

 

मातृ सदन ने स्पष्ट किया है कि यह संघर्ष माफियागिरी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अपराध के विरुद्ध है और तब तक जारी रहेगा जब तक वास्तविक दोषियों को सजा नहीं मिलती।

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