रिपोर्ट किसानपुत्र कार्तिक उपाध्याय

नैनीताल

 

16 फरवरी को नैनीताल विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय दावेदारी की तैयारी कर रहे युवा नेता शीलू कुमार द्वारा आयोजित बेतालघाट जनता सम्मेलन इन दिनों कुमाऊँ भर में चर्चा का विषय बना हुआ है।

चर्चा की सबसे बड़ी वजह यह रही कि विधानसभा चुनाव 2027 से काफी पहले आयोजित इस सम्मेलन में अचानक 7–8 हजार लोगों की भीड़ कैसे जुट गई। इस अप्रत्याशित भीड़ ने भाजपा-कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दलों को चौंका दिया और शीलू कुमार एकाएक राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गए।

 

 

हालांकि, सम्मेलन के दौरान देर शाम हल्की भगदड़ जैसी स्थिति बनी, जिसमें 2–3 महिलाएँ घायल हो गईं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मौके पर पुलिस व प्रशासनिक मौजूदगी न के बराबर थी।

शीलू कुमार ने उसी रात सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर घायलों को हल्द्वानी उपचार के लिए भेजने की जानकारी दी और दावा किया कि किसी की स्थिति गंभीर नहीं है। उनका यह भी कहना रहा कि कार्यक्रम की सफलता से विचलित होकर कुछ प्रतिद्वंद्वी और मीडिया का एक हिस्सा घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।

 

 

इस बीच मामला तब और गंभीर हो गया जब जानकारी सामने आई कि जिला खेल युवा कल्याण अधिकारी की ओर से एक प्रारंभिक रिपोर्ट पुलिस को सौंपी गई है और बताया जा रहा है कि शीलू कुमार के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। हालांकि, अब तक किसी नागरिक की ओर से औपचारिक तहरीर सामने नहीं आई है—यह तथ्य भी चर्चा में है।

 

 

विवाद ने नया मोड़ तब लिया जब शीलू कुमार की टीम ने सम्मेलन से संबंधित अनुमति व सूचना के दस्तावेज सार्वजनिक किए। टीम के अनुसार, कार्यक्रम से पहले पुलिस विभाग, जिला मजिस्ट्रेट सहित संबंधित अधिकारियों को लिखित सूचना दी गई थी और आवश्यक पुलिस व अन्य व्यवस्थाओं की मांग भी की गई थी।

टीम का दावा है कि क्षेत्रीय युवा कल्याण एवं प्रा०र० दल अधिकारी द्वारा एक दस्तावेज अनुमति के रूप में जारी भी किया गया था, जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है, जिसकी प्रतिलिपि स्वयं उक्त अधिकारी कार्यालय द्वारा थाना प्रभारी बेतालघाट, तहसीलदार बेतालघाट, मुख्य फायर स्टेशन हल्द्वानी, खेल मैदान प्रभारी आदि को भेजी गई

 

इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद सवाल प्रशासनिक भूमिका पर खड़े हो गए हैं। यदि पूर्व सूचना और अनुमति मौजूद थी, तो भीड़ नियंत्रण, पुलिस तैनाती और आपात प्रबंधन की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई? और यदि व्यवस्थाओं में कमी रही, तो कार्यक्रम आयोजक पर ही मुकदमा दर्ज करना क्या न्यायसंगत है?

 

वहीं प्रशासनिक सूत्रों का पक्ष है कि अचानक अत्यधिक भीड़ और स्थल की भौगोलिक सीमाएँ चुनौती बनीं, तथा अनुमति की शर्तों का पालन सुनिश्चित करना आयोजक की भी जिम्मेदारी होती है। प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था के पहलू पर तथ्यात्मक जांच के बाद ही अंतिम निष्कर्ष निकलेगा।

 

 

कुल मिलाकर, यह मामला केवल एक सम्मेलन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक तैयारी, अनुमति की प्रक्रिया और जवाबदेही जैसे व्यापक सवालों को जन्म दे रहा है। जांच के नतीजे चाहे जो हों, लेकिन यदि अनुमति के बाद भी आवश्यक व्यवस्थाएँ नहीं की गईं, तो यह प्रशासनिक चूक मानी जाएगी; और यदि शर्तों के उल्लंघन के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो आयोजक की जिम्मेदारी भी तय होगी।

 

 

फिलहाल, बेतालघाट सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में नैनीताल विधानसभा की राजनीति में शीलू कुमार एक गंभीर दावेदार के रूप में देखे जा रहे हैं—और प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्षता भी सार्वजनिक कसौटी पर

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