उत्तराखंड भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा—यह अब किसी से छिपा नहीं है। अगले वर्ष होने वाले चुनावों से पहले पार्टी की अंदरूनी खींचतान खुलकर जनता के सामने आ गई है। गदरपुर विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडे के इर्द-गिर्द चल रही घटनाओं ने भाजपा के भीतर गुटबाजी को और उजागर कर दिया है।
बीते दिनों अरविंद पांडे ने अपनी ही सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। उनके बयानों को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा गया। हालांकि यह बयान राजनीतिक शिष्टाचार के दायरे में बताए गए, लेकिन इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी।
पांडे के गदरपुर स्थित कैंप हाउस को सिंचाई विभाग और प्रशासन की ओर से 15 दिन में हटाने का नोटिस जारी कर दिया गया। इसके बाद राज्यसभा सांसद एवं गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी, पूर्व मुख्यमंत्री व हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत समेत कई वरिष्ठ नेताओं का गदरपुर दौरा प्रस्तावित था, जो अचानक रद्द हो गया। इस पर स्वयं अरविंद पांडे ने सामने आकर कहा कि उन्होंने ही नेताओं को आने से मना किया था। जिस दिन यह दौरा होना था, उस दिन पांडे के आवास के बाहर समर्थकों की भारी भीड़ जुटी, जिसे शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा गया।
इधर काशीपुर में मेयर दीपक बाली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अरविंद पांडे के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। उन्होंने संकेतों में यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी अनुशासन तोड़ने पर कार्रवाई तय है। यहीं से सवाल उठने लगे कि हाल ही में पार्टी से जुड़े और मेयर बने दीपक बाली को क्या पार्टी के भीतर पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडे से अधिक महत्व मिल गया है? या फिर मुख्यमंत्री धामी के करीबी होने के कारण उन्हें रणनीतिक रूप से आगे किया गया है?
दीपक बाली ही नहीं, अन्य कुछ नेताओं के भी मीडिया के सामने आकर पांडे के खिलाफ बयान देने से यह आभास होने लगा है कि भाजपा के भीतर दो गुट आमने-सामने हैं। बाहर से पार्टी यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि सब कुछ नियंत्रण में है, लेकिन अंदरूनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
बीते दिनों भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को भी विभिन्न स्थानों पर जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले पार्टी के भीतर बढ़ती कलह भाजपा के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष भले ही कमजोर हो, लेकिन पार्टी के अपने नेता ही आगामी चुनाव में भाजपा को झटका दे सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अरविंद पांडे को पार्टी से बाहर करने की चर्चाएं महज अफवाह हैं या वास्तव में इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाया जा सकता है? क्या मुख्यमंत्री धामी संगठन के भीतर इतने मजबूत हो चुके हैं कि एक पूर्व कैबिनेट मंत्री पर कठोर कार्रवाई कर सकें, या फिर केंद्रीय संगठन हस्तक्षेप कर मामले को शांत करेगा?
गौरतलब है कि अरविंद पांडे स्वयं को लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक बताते रहे हैं। इसी कारण यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी किसी पुराने स्वयंसेवक को इस तरह बाहर का रास्ता नहीं दिखाएगी। हालांकि तराई क्षेत्र में भाजपा की गुटबाजी लगातार गहराती दिख रही है।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में भाजपा के भीतर यह खाई कितनी गहरी होती है और पार्टी नेतृत्व इसे संभालने में कितना सफल रहता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड भाजपा की अंदरूनी राजनीति अब पूरी तरह सार्वजनिक मंच पर आ चुकी है।
