देहरादून। राज्य में चिकित्सकों की बहुप्रतीक्षित बांड नीति में जल्द बदलाव हो सकता है। स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर इसे अधिक व्यावहारिक और संतुलित बनाया जाएगा। लंबे समय से मेडिकल छात्रों और जूनियर डॉक्टरों की ओर से बांड अवधि, जुर्माना राशि और सेवा शर्तों में संशोधन की मांग उठाई जा रही थी।
सूत्रों के अनुसार, वर्तमान में सरकारी मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस और पीजी करने वाले छात्रों को निर्धारित अवधि तक अनिवार्य सेवा देनी होती है। सेवा नहीं देने की स्थिति में भारी भरकम जुर्माना राशि जमा करनी पड़ती है। कई छात्रों का कहना है कि बांड राशि अधिक होने और सेवा की शर्तें स्पष्ट न होने से उन्हें मानसिक और आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि नई प्रस्तावित नीति में बांड अवधि को तर्कसंगत बनाने, जुर्माना राशि की समीक्षा करने और दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने वाले चिकित्सकों को अतिरिक्त प्रोत्साहन देने जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। सरकार का उद्देश्य है कि ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर की जा सके, वहीं युवा चिकित्सकों के हितों का भी संरक्षण हो।
माना जा रहा है कि इस विषय पर उच्चस्तरीय बैठक में विस्तृत चर्चा के बाद संशोधित प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। यदि सब कुछ तय समय पर हुआ तो आगामी सत्र में नई बांड नीति को मंजूरी मिल सकती है।
चिकित्सक संगठनों ने सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि यदि नीति संतुलित और पारदर्शी बनी तो इससे स्वास्थ्य सेवाओं में स्थायित्व आएगा। वहीं, विपक्ष ने मांग की है कि निर्णय लेने से पहले सभी हितधारकों से व्यापक संवाद किया जाए।
राज्य में डॉक्टरों की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। ऐसे में बांड नीति में संभावित बदलाव को स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
