‘जमीन उत्तराखंड की, खनिज उत्तराखंड के… फिर आर्थिक अधिकारों पर अंकुश क्यों?’ MMDR Amendment Bill 2026 की धारा 9D पर किसान मंच ने CM धामी को लिखा पत्र, राज्य के भविष्य के राजस्व पर मांगा जवाब
हल्द्वानी/देहरादून। संसद से पारित Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 अब उत्तराखंड में भी प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार और भविष्य के राजस्व को लेकर सवालों के घेरे में है। किसान मंच उत्तराखंड ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर नई धारा 9D का उत्तराखंड की वित्तीय स्वायत्तता, खनिज राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णयकारी भागीदारी के नजरिए से उच्चस्तरीय परीक्षण कराने की मांग की है।
विधेयक की धारा 9D के तहत राज्य सरकारें mineral rights अथवा mineral-bearing lands पर tax, cess या अन्य levy केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों अथवा प्रतिबंधों के अनुरूप ही लगा सकेंगी। संसद ने विधेयक को 13 अगस्त को मंजूरी दी थी। केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे खनन क्षेत्र में कर व्यवस्था अधिक एकरूप, स्थिर और अनुमानित होगी, जबकि राज्यों के कराधान अधिकारों को लेकर संघीय ढांचे से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं।
उप जिलाधिकारी हल्द्वानी के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि उत्तराखंड केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं है। प्रदेश जल, जंगल, जमीन, नदियों और बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न है और यही प्राकृतिक संपदा आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा की पूंजी भी है।
सवाल सीधा—असर उत्तराखंड झेले तो आर्थिक भागीदारी कमजोर क्यों हो?
किसान मंच ने मुख्यमंत्री के सामने सवाल रखा है कि जमीन उत्तराखंड की है, खनिज उत्तराखंड की धरती में हैं, खनन का पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव प्रदेश झेलता है, पहाड़ और नदियां प्रभावित होती हैं और खनिज परिवहन का दबाव भी राज्य की सड़कों पर पड़ता है, तो प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व जुटाने से जुड़े निर्णयों में उत्तराखंड की शक्ति कमजोर क्यों हो?
यह चिंता केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। मूल विधेयक में नई धारा 9D राज्य द्वारा mineral rights और mineral-bearing lands पर लगाए जाने वाले tax, cess अथवा अन्य levy को केंद्र द्वारा निर्धारित conditions/restrictions से जोड़ती है। विधेयक mineral-bearing lands को केंद्रीय नियमन के दायरे में लाने का भी प्रावधान करता है।
‘आज का फैसला आने वाली कई पीढ़ियों को प्रभावित करेगा’
मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में किसान मंच ने प्राकृतिक संसाधनों को उत्तराखंड के दीर्घकालीन आर्थिक भविष्य से जोड़ते हुए कहा है कि आज दुनिया में इन संसाधनों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। उत्तराखंड के पास जल, जंगल, जमीन, नदियां और खनिज हैं। इनका संरक्षण जरूरी है, लेकिन इनसे जुड़े फैसलों में प्रदेश की मजबूत आर्थिक और निर्णयकारी भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
मंच ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित अधिकारों में आज होने वाला बदलाव केवल वर्तमान सरकार या आज के राजस्व का विषय नहीं है। इसके परिणाम कई दशकों तक सामने आ सकते हैं।
पत्र में मुख्यमंत्री से कहा गया है कि भविष्य में उत्तराखंड अपने ही प्राकृतिक संसाधनों से पर्याप्त राजस्व जुटाने की क्षमता में कमजोर न पड़े, यह सुनिश्चित करना वर्तमान सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
उत्तराखंड सरकार ने केंद्र के सामने क्या पक्ष रखा? सार्वजनिक करने की मांग
किसान मंच ने मुख्यमंत्री से यह भी बताने को कहा है कि इस विधेयक के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा उत्तराखंड से कोई राय, सुझाव या आपत्ति मांगी गई थी या नहीं।
यदि राय मांगी गई थी तो प्रदेश सरकार ने केंद्र के सामने क्या पक्ष रखा, इसकी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
मंच चाहता है कि राज्य सरकार धारा 9D के प्रभाव का विस्तृत वित्तीय अध्ययन कराकर बताए कि इससे उत्तराखंड की वर्तमान और भविष्य की tax, cess और अन्य levy लगाने की क्षमता तथा खनिज राजस्व पर वास्तविक रूप से क्या असर पड़ेगा।
पुराने बकायों पर भी बड़ा सवाल
विधेयक में संशोधन लागू होने से पहले के ऐसे राज्य levies, जो जमा या वसूल नहीं हुए हैं, उन्हें अमान्य मानने का प्रावधान भी शामिल है; वहीं पहले से जमा रकम लौटाने का प्रावधान नहीं है।
इसी को देखते हुए किसान मंच ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि उत्तराखंड सरकार तत्काल आकलन कराए कि ऐसे प्रावधानों से प्रदेश के किसी लंबित या संभावित राजस्व पर असर पड़ता है या नहीं। यदि प्रदेश को आर्थिक नुकसान होने की संभावना है तो उसकी अनुमानित राशि जनता के सामने रखी जाए।
केंद्र नियम बनाए उससे पहले उत्तराखंड रखे अपना पक्ष
किसान मंच ने मांग की है कि धारा 9D के तहत केंद्र सरकार द्वारा विस्तृत नियम और शर्तें निर्धारित किए जाने से पहले उत्तराखंड सरकार औपचारिक रूप से अपना प्रस्ताव केंद्र के पास भेजे।
इसमें उत्तराखंड की हिमालयी भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सीमित आर्थिक संसाधनों को देखते हुए प्रदेश की पर्याप्त वित्तीय एवं निर्णयकारी भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की जाए।
यदि विधिक और आर्थिक परीक्षण में यह सामने आता है कि संशोधन का कोई प्रावधान उत्तराखंड की दीर्घकालीन वित्तीय स्वायत्तता या आर्थिक हितों के प्रतिकूल है तो किसान मंच ने सरकार से उपलब्ध संवैधानिक और कानूनी माध्यमों के जरिए आपत्ति दर्ज कराने तथा आवश्यक संशोधन या सुरक्षा प्रावधान की मांग करने को कहा है।
सिर्फ अफसर नहीं, अर्थशास्त्री-वकील-भूवैज्ञानिक भी बैठें
किसान मंच ने इस पूरे मामले का परीक्षण केवल विभागीय अधिकारियों तक सीमित नहीं रखने की मांग की है। मंच का कहना है कि अर्थशास्त्रियों, विधि विशेषज्ञों, भूवैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और संबंधित हितधारकों को साथ बैठाकर उत्तराखंड पर पड़ने वाले दीर्घकालीन प्रभाव का अध्ययन कराया जाना चाहिए।
मंच ने यह भी स्पष्ट किया कि वह विकास या देश में पारदर्शी और एकरूप व्यवस्था का विरोध नहीं कर रहा। केंद्र सरकार यदि खनिज कराधान में निश्चितता और एकरूपता चाहती है तो उसके तर्कों का भी अध्ययन होना चाहिए। केंद्र ने भी विधेयक का उद्देश्य कई तरह के और अप्रत्याशित levies को रोककर खनन क्षेत्र के लिए स्थिर एवं अनुमानित वित्तीय व्यवस्था बनाना बताया है।
लेकिन किसान मंच का तर्क है कि राष्ट्रीय एकरूपता बनाते समय उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों की अलग पर्यावरणीय, भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
‘यह केंद्र बनाम राज्य की राजनीति नहीं, उत्तराखंड की अगली पीढ़ियों का सवाल’
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने पत्र में कहा है कि इसे केंद्र बनाम राज्य की राजनीतिक लड़ाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। प्रश्न यह है कि उत्तराखंड की धरती में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े आर्थिक निर्णयों में प्रदेश की मजबूत भागीदारी भविष्य में भी बनी रहे।
किसान मंच ने मुख्यमंत्री से पूरे मामले का तत्काल उच्चस्तरीय परीक्षण कराने, उत्तराखंड पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव को सार्वजनिक करने और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार के सामने प्रदेश का पक्ष मजबूती से रखने की मांग की है।
पत्र में उठाया गया अंतिम सवाल इस पूरे विवाद का सार भी है—
“जल हमारा, जंगल हमारा, जमीन हमारी, खनिज हमारे—तो इनके संबंध में उत्तराखंड की मजबूत निर्णयकारी और आर्थिक भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।”
