हाईकोर्ट बनने में वक्त लगेगा, जमीनों का बाजार अभी से दौड़ा! बेलबाबा के गांवों में VIP गाड़ियां, खेत-खलिहान बने ‘हॉट प्रॉपर्टी’
VandemataramSwatantraAwaaz.com | हल्द्वानी
नैनीताल हाईकोर्ट की नई इमारत बेलबाबा क्षेत्र में आखिर कब बनेगी? निर्माण कार्य कब शुरू होगा? अदालत कब नैनीताल से यहां स्थानांतरित होगी और नए परिसर में न्यायाधीश कब बैठकर मुकदमों की सुनवाई शुरू करेंगे? इन सवालों के ठोस जवाब मिलने में अभी वक्त लग सकता है।
लेकिन एक चीज ने सरकारी प्रक्रियाओं का इंतजार नहीं किया—जमीन का बाजार।
बेलबाबा-रामपुर रोड क्षेत्र में प्रस्तावित हाईकोर्ट परिसर को लेकर कैबिनेट की मंजूरी सामने आने के बाद आसपास के गांवों में जमीन तलाशने वालों की जबर्दस्त दौड़ दिखाई देने लगी है। स्थानीय लोगों के मुताबिक प्रॉपर्टी डीलर लगातार क्षेत्र का चक्कर लगा रहे हैं और उन गांवों की तंग गलियों में भी बड़ी-बड़ी लग्जरी और VIP गाड़ियां नजर आने लगी हैं, जहां पहले बाहरी वाहनों की ऐसी आवाजाही आम नहीं थी।
उत्तराखंड कैबिनेट ने 7 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के लामाचौड़ क्षेत्र में प्रस्तावित नए हाईकोर्ट परिसर के लिए वन भूमि हस्तांतरण को मंजूरी दी। अलग-अलग रिपोर्टों में भूमि का क्षेत्रफल करीब 38 से 40 हेक्टेयर बताया गया है।
कोई घर के लिए जमीन खोज रहा, किसी की नजर होटल-कॉम्प्लेक्स पर
स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारी के अनुसार प्रस्तावित स्थल के आसपास जमीन की मांग केवल मकान बनाने तक सीमित नहीं है।
कोई भविष्य में आवास बनाने के लिए प्लॉट तलाश रहा है तो कोई होटल, गेस्ट हाउस, रेस्टोरेंट, अधिवक्ता कार्यालय या बड़े कमर्शियल कॉम्प्लेक्स की संभावना देख रहा है। प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े लोग खेतों से लेकर सड़क किनारे की जमीन तक की जानकारी जुटाने में लगे हैं।
सबसे ज्यादा नजर उन जमीनों पर बताई जा रही है, जिनकी हाईवे या प्रमुख संपर्क मार्गों तक सीधी पहुंच है।
लगभग दो किलोमीटर के दायरे में कीमतों को लेकर हलचल
हाईकोर्ट की चर्चा का सबसे तेज असर बेलबाबा के आसपास करीब दो किलोमीटर के दायरे में देखने को मिल रहा है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक जो जमीनें कुछ समय पहले तक सामान्य कृषि या ग्रामीण आवासीय भूमि के रूप में देखी जाती थीं, उन्हें अब भविष्य की व्यावसायिक संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है।
इससे जमीन मालिकों की कीमत संबंधी अपेक्षाएं भी तेजी से बदली हैं। कई लोग जमीन तत्काल बेचने के बजाय इंतजार करने के मूड में बताए जा रहे हैं कि हाईकोर्ट की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
हालांकि अलग-अलग गांवों में वास्तविक बिक्री मूल्य और रजिस्ट्री दरों में कितना परिवर्तन हुआ है, इसका आधिकारिक तुलनात्मक आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है।
बड़ी गाड़ियों ने गांव वालों को भी चौंकाया
क्षेत्र में सबसे ज्यादा चर्चा बाहर से आ रही बड़ी गाड़ियों की है।
ग्रामीणों के अनुसार कई लोग सीधे खेतों और जमीन मालिकों तक पहुंचकर जमीन की उपलब्धता पूछ रहे हैं। प्रॉपर्टी डीलरों की सक्रियता भी बढ़ी है। कौन जमीन बेचना चाहता है, किसके पास कितनी भूमि है और किस जमीन तक सड़क पहुंचती है—ऐसी जानकारियां तेजी से जुटाई जा रही हैं।
वकीलों, कारोबारियों, निवेशकों और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोगों द्वारा भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर आसपास की संपत्तियों में दिलचस्पी दिखाने की चर्चाएं भी स्थानीय स्तर पर हैं। हालांकि किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा जमीन खरीदने के दावों की स्वतंत्र या दस्तावेजी पुष्टि अभी नहीं हुई है।
अभी बिल्डिंग दूर, लेकिन ‘हाईकोर्ट इफेक्ट’ गांवों तक पहुंचा
यह पूरी तस्वीर इसलिए दिलचस्प है क्योंकि हाईकोर्ट के नए भवन के निर्माण से पहले अभी कई प्रशासनिक और वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी होनी हैं।
15 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें हल्द्वानी की पहले प्रस्तावित भूमि को स्वीकार नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्थानांतरण से जुड़े विषय को प्रशासनिक स्तर पर तय किए जाने वाला मामला माना और हल्द्वानी में भूमि उपलब्ध कराने का रास्ता साफ किया।
इसके बाद अगस्त में राज्य कैबिनेट ने नई साइट के लिए भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव को मंजूरी दी। यानी हाईकोर्ट परिसर की इमारत अभी धरातल पर आनी बाकी है, लेकिन उससे पैदा होने वाली संभावित आर्थिक गतिविधियों का अनुमान बाजार ने अभी से लगाना शुरू कर दिया है।
कैसे शुरू हुई थी हाईकोर्ट शिफ्टिंग की कहानी?
नैनीताल से हाईकोर्ट को मैदानी क्षेत्र में स्थानांतरित करने की चर्चा नई नहीं है। राज्य सरकार ने पहले हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में करीब 26 हेक्टेयर भूमि प्रस्तावित की थी।
मई 2024 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उस जमीन को स्वीकार नहीं किया। अदालत के सामने पर्यावरण और वन क्षेत्र से जुड़े सवाल आए तथा यह बताया गया कि प्रस्तावित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा पेड़ों से आच्छादित था।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और जुलाई 2026 के फैसले ने एक बार फिर हल्द्वानी में हाईकोर्ट स्थापना का रास्ता खोल दिया।
अब गौलापार के बजाय बेलबाबा-लामाचौड़ क्षेत्र इस पूरी कवायद के केंद्र में आ गया है।
सवाल यह भी—विकास होगा नियोजित या जमीन के खेल के हवाले?
हाईकोर्ट जैसे बड़े संस्थान का आना किसी भी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और भूगोल को बदल सकता है। भविष्य में यहां अधिवक्ता कार्यालय, आवास, होटल, रेस्टोरेंट, बैंक, पार्किंग, स्टेशनरी, फोटोकॉपी, परिवहन और दूसरी सेवाओं की जरूरत बढ़ सकती है।
लेकिन जमीन की अचानक बढ़ती मांग के बीच सरकार और प्रशासन के सामने एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है—क्या हाईकोर्ट के आसपास का विकास सुनियोजित तरीके से होगा या निर्माण शुरू होने से पहले ही पूरा क्षेत्र अनियोजित प्लॉटिंग और जमीन की सट्टेबाजी की चपेट में आ जाएगा?
आने वाले दिनों में जमीनों की रजिस्ट्री, कृषि भूमि के उपयोग परिवर्तन, प्लॉटिंग और सरकारी व वन भूमि की सीमाओं पर प्रशासन की निगरानी इसलिए बेहद महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल तस्वीर साफ है—बिल्डिंग कब बनेगी, हाईकोर्ट कब बैठेगा और नई अदालत से न्याय को कितनी गति मिलेगी, इसके लिए इंतजार करना होगा; लेकिन जमीनों की खरीद-फरोख्त की दौड़ ने बेलबाबा के गांवों में अभी से रफ्तार पकड़ ली है।
