‘आरोग्य मंदिर’ में कर्मचारियों का ही आर्थिक स्वास्थ्य बेहाल! 4 महीने से वेतन नहीं, अफसरों से गुहार भी बेअसर—किसान मंच ने सरकार को दिया 48 घंटे का अल्टीमेटम
हल्द्वानी में कर्मचारियों ने प्रेस वार्ता में सुनाया दर्द—किसी की मां बीमार तो किसी के सामने घर चलाने का संकट; आरोप, कंपनी देती रही तारीखें और आवाज उठाने पर बनाया गया दबाव
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हल्द्वानी। जिस शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिर को आम जनता के बेहतर स्वास्थ्य और घर के नजदीक उपचार की बड़ी सरकारी व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसी व्यवस्था में काम करने वाले कर्मचारी यदि चार महीने से अपनी तनख्वाह के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हों तो सवाल सिर्फ एक कंपनी या कुछ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है।
हल्द्वानी में शुक्रवार को शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों से जुड़े कर्मचारियों ने प्रेस वार्ता कर अपनी समस्याएं सार्वजनिक कीं। कर्मचारियों का आरोप है कि करीब चार महीने से उनका वेतन लंबित है, लेकिन समाधान के बजाय उन्हें लगातार नई-नई तारीखें दी जा रही हैं।
कर्मचारियों के समर्थन में उतरे किसान मंच उत्तराखंड ने सरकार, स्वास्थ्य विभाग और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए दो टूक कहा कि यदि सरकार योजनाएं बना सकती है तो उसे उन योजनाओं में काम करने वाले कर्मचारियों की स्थिति का मूल्यांकन भी करना चाहिए।
‘जब कर्मचारी ही परेशान है तो जनता को बेहतर उपचार कैसे मिलेगा?’
किसान मंच की ओर से कहा गया कि आरोग्य मंदिरों में तैनात कर्मचारी जनता को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, लेकिन वही कर्मचारी आर्थिक और मानसिक परेशानी से गुजर रहे हैं।
मंच ने सवाल किया—
“जो कर्मचारी रोज जनता की बीमारी और परेशानी से जूझ रहा है, अगर उसके अपने घर की आर्थिक व्यवस्था चार महीने से वेतन न मिलने के कारण बिगड़ जाए तो उससे बेहतर स्वास्थ्य सेवा की उम्मीद आखिर कैसे की जाएगी?”
मंच का कहना है कि सरकारी योजनाओं की सफलता केवल उद्घाटन, आंकड़ों और प्रचार से तय नहीं हो सकती। वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि योजना से जनता को क्या सुविधा मिल रही है और उसे धरातल पर चलाने वाले कर्मचारियों की स्थिति क्या है।
कंपनी पर ‘तारीख पर तारीख’ देने का आरोप
प्रेस वार्ता में कर्मचारी बीना ने आरोप लगाया कि करीब चार महीने से वेतन का भुगतान नहीं हुआ है और कंपनी की ओर से बार-बार भुगतान की अलग-अलग तारीखें बताई जाती रही हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कर्मचारियों पर मामला प्रेस के सामने न उठाने का दबाव बनाया गया।
बीना के मुताबिक कर्मचारी अपनी समस्या लेकर श्रम आयुक्त से लेकर कुमाऊँ कमिश्नर तक गुहार लगा चुके हैं, लेकिन अब तक उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।
नगर स्तर के अधिकारियों के समक्ष भी मामला उठाए जाने की बात कही गई। कर्मचारियों का आरोप है कि समाधान के बजाय उन्हें आश्वासन ही मिलते रहे।
यदि कर्मचारियों के आरोप सही हैं तो यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि कई स्तरों पर शिकायत पहुंचने के बावजूद चार महीने का वेतन लंबित कैसे रहा?
‘मां बीमार थीं, रातभर अस्पताल में रोता रहा’—ललित कुमार
प्रेस वार्ता में फार्मेसी से जुड़े कर्मचारी ललित कुमार ने अपनी पारिवारिक परेशानी बताते हुए कहा कि उनकी माताजी का स्वास्थ्य खराब हो गया था।
ललित ने कहा कि वेतन न मिलने के कारण आर्थिक संकट पहले से था और मां की बीमारी के दौरान स्थिति और कठिन हो गई।
उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा—
“मेरी माताजी का स्वास्थ्य खराब हुआ। मैं रातभर अस्पताल में परेशान रहा और रोता रहा। सरकार हमारे प्रति गंभीर नहीं दिखाई दे रही है। हमें और कुछ नहीं चाहिए, कम से कम हमारी मेहनत की तनख्वाह तो दिला दी जाए।”
उनकी बात ने प्रेस वार्ता में उस सवाल को और गंभीर बना दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था में काम करने वाला व्यक्ति अपने ही परिवार के उपचार के समय आर्थिक असहायता महसूस करे तो आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
‘कंपनी बदले या टेंडर, कर्मचारी की तनख्वाह क्यों रुके?’
किसान मंच ने आउटसोर्सिंग और टेंडर आधारित व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।
मंच का कहना है कि एक कंपनी के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी कंपनी को जिम्मेदारी दिए जाने की व्यवस्था में कर्मचारी के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और विभाग की जिम्मेदारी है।
किसान मंच ने कहा—
“सरकार के लिए कंपनी और टेंडर महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन कर्मचारी के लिए उसका परिवार और उसकी तनख्वाह महत्वपूर्ण है। उसने काम किया है तो भुगतान समय पर होना चाहिए। विभाग और कंपनी के बीच की व्यवस्था की कीमत कर्मचारी क्यों चुकाए?”
मंच ने कहा कि स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा को केवल टेंडर प्रक्रिया का विषय बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।
एक ही योजना, फिर कर्मचारियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था क्यों?
प्रेस वार्ता में यह मुद्दा भी उठा कि एक ही सरकारी व्यवस्था में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सेवा और भुगतान संबंधी व्यवस्थाओं में अंतर क्यों दिखाई देता है।
किसान मंच ने सरकार से मांग की कि वह सार्वजनिक करे कि संबंधित कंपनी के साथ हुए अनुबंध में कर्मचारियों को समय पर वेतन देने के क्या नियम हैं।
यदि निर्धारित समय में वेतन न दिया जाए तो संबंधित संस्था के विरुद्ध जुर्माने, भुगतान रोकने अथवा अनुबंध पर कार्रवाई का क्या प्रावधान है?
और यदि ऐसे प्रावधान मौजूद हैं तो अब तक उनका उपयोग क्यों नहीं किया गया?
किसान मंच का 48 घंटे का अल्टीमेटम
किसान मंच ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग को कर्मचारियों की समस्या का समाधान करने तथा लंबित वेतन जारी कराने के लिए 48 घंटे का समय देने की बात कही है।
मंच ने कहा कि सरकार कर्मचारियों को फिर केवल आश्वासन या नई तारीख देकर मामला समाप्त करने का प्रयास न करे।
मांग की गई कि कर्मचारियों का बकाया भुगतान तत्काल कराया जाए और यह भी जांच की जाए कि इतने लंबे समय तक वेतन लंबित रहने के लिए जिम्मेदार कौन है।
यदि समाधान नहीं हुआ तो कर्मचारी हित में आंदोलन को और तेज करने की रणनीति बनाई जा सकती है।
सरकार से सात सीधे सवाल
इस पूरे प्रकरण के बाद कई सवाल खड़े हैं—
आरोग्य मंदिर कर्मचारियों का वेतन वास्तव में कितने समय से लंबित है?
वेतन भुगतान की सीधी जिम्मेदारी किस कंपनी और किस अधिकारी की है?
कर्मचारियों की पूर्व शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
समय से वेतन न देने पर संबंधित कंपनी के खिलाफ क्या दंडात्मक प्रावधान हैं?
अधिकारियों तक मामला पहुंचने के बाद भी समाधान क्यों नहीं हुआ?
क्या विभाग ने कंपनी के भुगतान एवं कर्मचारी वेतन रिकॉर्ड की जांच की?
और सबसे महत्वपूर्ण—48 घंटे में कर्मचारियों को तनख्वाह मिलेगी या एक बार फिर केवल अगली तारीख?
स्वतंत्र आवाज का सवाल
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर केवल भवनों पर लगे ‘आरोग्य मंदिर’ के बोर्ड से तय नहीं होगी।
उसकी असली परीक्षा तब होगी जब वहां इलाज कराने पहुंचा नागरिक संतुष्ट हो और वहां सेवा देने वाला कर्मचारी भी सम्मानपूर्वक अपना परिवार चला सके।
चार महीने तक किसी कर्मचारी की मेहनत की कमाई रोकना केवल आर्थिक मामला नहीं है—उसके परिवार, बच्चों, इलाज, किराए और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा सवाल है।
अब जिम्मेदारी सरकार और विभाग की है कि वह कर्मचारियों के आरोपों का जवाब तथ्यों के साथ सामने रखे और यदि वेतन वास्तव में लंबित है तो बिना और तारीख दिए भुगतान सुनिश्चित करे।
क्योंकि सवाल सीधा है—
“जनता का स्वास्थ्य संभालने वालों के घर का आर्थिक स्वास्थ्य कौन संभालेगा?”
VandeMataramSwatantraAwaaz.com संबंधित विभाग, कंपनी अथवा प्रशासन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।
