मातृ सदन प्रकरण में बड़ा न्यायिक हस्तक्षेप: उच्च न्यायालय ने ब्रह्मचारी दयानन्द की याचिका स्वीकार कर निचली अदालतों के आदेश किए निरस्त, दीपक रावत एवं गनर से जुड़े शिकायत वाद को पुनः सुनवाई हेतु भेजा
ब्रह्मचारी सुधानन्द की कानूनी लड़ाई को मिली बड़ी सफलता, उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने कहा— उपलब्ध साक्ष्यों पर समुचित न्यायिक विचार नहीं किया गया
हरिद्वार/नैनीताल।
वर्ष 2017 की एक बहुचर्चित घटना से जुड़े मामले में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए निचली अदालतों द्वारा पारित दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया है। यह मामला मातृ सदन से जुड़े ब्रह्मचारी दयानन्द द्वारा दायर शिकायत से संबंधित है, जिसमें तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत, उनके गनर तथा अन्य लोगों के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए गए थे।
माननीय न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने दिनांक 13 जुलाई 2026 को पारित अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शिकायत को खारिज करते समय उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया तथा पुनरीक्षण न्यायालय ने भी स्वतंत्र रूप से मामले की विधिक समीक्षा नहीं की।
परिणामस्वरूप दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए प्रकरण को पुनः विचार के लिए संबंधित न्यायालय को वापस भेज दिया गया।
मातृ सदन और संघर्ष की पृष्ठभूमि
हरिद्वार स्थित मातृ सदन लंबे समय से गंगा, पर्यावरण, खनन और जनहित के मुद्दों पर संघर्षों के लिए जाना जाता है। इसी संस्थान से जुड़े ब्रह्मचारी दयानन्द ने आरोप लगाया था कि 25 दिसम्बर 2017 को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उनके साथ मारपीट और अन्य आपराधिक घटनाएं हुईं।
घटना के बाद उन्होंने पुलिस अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उनके अनुसार एफआईआर दर्ज नहीं की गई। बाद में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हरिद्वार को भी शिकायत भेजी गई, किंतु वहां भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
जब पुलिस तंत्र से राहत नहीं मिली, तब उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
2018 में दायर हुआ शिकायत वाद
ब्रह्मचारी दयानन्द ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अंतर्गत न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत की। यह मामला शिकायत वाद संख्या 02/2018 के रूप में दर्ज हुआ।
शिकायत में विभिन्न धाराओं के अंतर्गत अपराध किए जाने का आरोप लगाया गया। शिकायतकर्ता ने अपने समर्थन में:
स्वयं का बयान,
प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान,
चिकित्सीय अभिलेख,
अन्य दस्तावेजी साक्ष्य
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए।
निचली अदालत ने कर दी शिकायत खारिज
मामले की सुनवाई के बाद हरिद्वार के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट/प्रथम अपर वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश ने 19 सितम्बर 2023 को शिकायत को खारिज कर दिया।
न्यायालय ने माना कि प्रस्तुत सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया आगे की कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनता।
इस निर्णय से असंतुष्ट होकर ब्रह्मचारी दयानन्द ने पुनरीक्षण याचिका दायर की।
पुनरीक्षण न्यायालय से भी नहीं मिली राहत
मामला हरिद्वार के प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष पहुँचा।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया है, लेकिन पुनरीक्षण न्यायालय ने 18 फरवरी 2026 को मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी।
इसके बाद मामला उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय पहुँचा।
उच्च न्यायालय में ब्रह्मचारी सुधानन्द ने रखा पक्ष
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ब्रह्मचारी सुधानन्द ने विस्तृत पैरवी की।
उन्होंने न्यायालय को बताया कि:
पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई नहीं की।
धारा 200 एवं 202 Cr.P.C. के तहत बयान दर्ज थे।मेडिकल साक्ष्य उपलब्ध थे।
दस्तावेजी सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद थी।
इसके बावजूद शिकायत को प्रारम्भिक स्तर पर ही समाप्त कर दिया गया।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि शिकायत पर विचार करते समय न्यायालय को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, न कि यह कि अंतिम रूप से दोषसिद्धि होगी या नहीं।
उच्च न्यायालय ने क्या पाया?
माननीय न्यायालय ने पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि:
1. साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं हुआ
निचली अदालत ने धारा 200 और 202 के अंतर्गत दर्ज बयानों, मेडिकल रिपोर्ट तथा दस्तावेजी साक्ष्यों पर उनके उचित परिप्रेक्ष्य में विचार नहीं किया।
2. ट्रायल से पहले ही निष्कर्ष निकाल लिए गए
उच्च न्यायालय ने कहा कि जिन विवादित तथ्यों का निर्णय ट्रायल के दौरान होना चाहिए था, उन पर प्रारम्भिक चरण में ही निष्कर्ष निकाल लिए गए।
3. पुनरीक्षण न्यायालय ने स्वतंत्र परीक्षण नहीं किया
उच्च न्यायालय ने पाया कि पुनरीक्षण न्यायालय ने यह नहीं परखा कि मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकारों का प्रयोग विधि के अनुरूप किया था या नहीं।
उसने केवल निचली अदालत के निष्कर्षों को दोहरा दिया।
“Non-Application of Mind” की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जिसमें उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों आदेश “Non-Application of Mind” अर्थात पर्याप्त न्यायिक विचार के अभाव से ग्रस्त हैं।
कानूनी भाषा में यह अत्यंत गंभीर टिप्पणी मानी जाती है।
इसका अर्थ यह नहीं होता कि कोई पक्ष स्वतः सही या गलत साबित हो गया, बल्कि इसका अर्थ है कि उपलब्ध सामग्री पर अपेक्षित न्यायिक परीक्षण नहीं किया गया।
दोनों आदेश किए गए निरस्त.माननीय न्यायालय ने:
19 सितम्बर 2023 का मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया।
18 फरवरी 2026 का पुनरीक्षण न्यायालय का आदेश भी निरस्त कर दिया।
साथ ही पूरे मामले को पुनः विचार के लिए संबंधित न्यायालय को वापस भेज दिया।
हमारा मानना आगे क्या होगा?
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि संबंधित न्यायालय:
धारा 200 Cr.P.C. के बयान,
धारा 202 Cr.P.C. के बयान,
मेडिकल साक्ष्य,
दस्तावेजी साक्ष्य
का पुनः परीक्षण करे और विधि के अनुसार नया आदेश पारित करे।
अब मजिस्ट्रेट को दोबारा यह तय करना होगा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए या नहीं।
दीपक रावत और गनर प्रकरण पर फिर टिकी निगाहें
यद्यपि उच्च न्यायालय ने किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित नहीं किया है, लेकिन यह आदेश निश्चित रूप से उस शिकायत वाद को पुनर्जीवित करता है जो पहले समाप्त हो चुका था।
तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत, उनके गनर तथा अन्य संबंधित पक्षों से जुड़े इस प्रकरण में अब एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और संबंधित न्यायालय को नए सिरे से विचार करना होगा।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह आदेश केवल एक शिकायत वाद की बहाली नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि कोई पक्ष यह महसूस करता है कि उपलब्ध साक्ष्यों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है, तो उच्च न्यायालय न्यायिक समीक्षा के माध्यम से हस्तक्षेप कर सकता है।
मातृ सदन से जुड़े इस बहुचर्चित मामले में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय का यह आदेश आने वाले दिनों में कानूनी और सार्वजनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना रहेगा।
विशेष संवाददाता
वंदे मातरम् स्वतंत्र आवाज़
