कैंची धाम में वीआईपी मूवमेंट बना बहस का विषय: क्या लोकतंत्र में अब भी जारी है अंग्रेजों वाला ‘वीआईपी कल्चर’?

नैनीताल पुलिस के डायवर्जन प्लान के बाद सोशल मीडिया पर उठे सवाल, आम जनता की आवाजाही रोकी गई तो वीआईपी व्यवस्था पर फिर शुरू हुई चर्चा

नैनीताल।

कैंची धाम में 19 जून को प्रस्तावित वीआईपी भ्रमण कार्यक्रम को लेकर जारी किए गए विशेष यातायात एवं डायवर्जन प्लान ने प्रदेशभर में नई बहस को जन्म दे दिया है। नैनीताल पुलिस द्वारा जारी व्यवस्था के अनुसार वीआईपी फ्लीट के आवागमन के दौरान विभिन्न स्थानों पर आम वाहनों को रोका जाएगा, निजी वाहनों को निर्धारित पार्किंग में खड़ा कराया जाएगा और कुछ मार्गों पर विशेष प्रतिबंध भी लागू रहेंगे।
हालांकि प्रशासन का तर्क है कि यह व्यवस्था सुरक्षा और यातायात संचालन को सुचारु रखने के लिए आवश्यक है, लेकिन सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग इसे “वीआईपी कल्चर” का उदाहरण बताते हुए सवाल उठा रहे हैं।

कई लोगों का कहना है कि आजादी के 79 वर्ष बाद भी आम नागरिकों को सड़क पर रोककर वीआईपी आवागमन को प्राथमिकता देना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। सोशल मीडिया पर वायरल टिप्पणियों में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि यदि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है तो फिर जनता को घंटों रोकने वाली व्यवस्थाएं क्यों लागू की जाती हैं।

विशेष रूप से कैंची धाम जैसे धार्मिक स्थल के संदर्भ में भी लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि धार्मिक यात्रा पर आए आम नागरिकों को असुविधा झेलनी पड़ती है जबकि कुछ चुनिंदा लोगों के लिए पूरे यातायात तंत्र को बदल दिया जाता है।
दूसरी ओर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों तथा विशेष सुरक्षा प्राप्त लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी है। ऐसे में कई बार अस्थायी यातायात प्रतिबंध अपरिहार्य हो जाते हैं। उनका तर्क है कि चुनौती सुरक्षा और जनसुविधा के बीच संतुलन बनाने की है।

दिलचस्प बात यह है कि यह बहस केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न राज्यों में वीआईपी मूवमेंट के दौरान यातायात रोकने, एम्बुलेंस फंसने और आम जनता को होने वाली परेशानियों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी अतीत में वीआईपी संस्कृति को लेकर कई बार टिप्पणी कर चुका है कि लोकतंत्र में विशेषाधिकारों का प्रदर्शन सीमित होना चाहिए।
फिलहाल कैंची धाम के लिए जारी डायवर्जन प्लान ने एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है—क्या लोकतांत्रिक भारत में शासन व्यवस्था अभी भी उस औपनिवेशिक सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है, जहां सत्ता के लिए रास्ते खाली कराए जाते थे और आम नागरिक प्रतीक्षा करते थे?

यही प्रश्न आज सोशल मीडिया पर सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

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