करीब दो साल बाद सरकार हुई सक्रिय, बॉबी पंवार, कार्तिक उपाध्याय समेत पांच युवाओं के मामले में हाईकोर्ट में स्टे हटाने की अर्जी दाखिल
नैनीताल। उत्तराखंड के चर्चित बागेश्वर प्रकरण में राज्य सरकार ने लगभग दो वर्ष बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय में स्टे वेकेशन एप्लीकेशन (Stay Vacation Application) दाखिल कर 25 जुलाई 2024 से लागू स्थगन आदेश (स्टे) को समाप्त करने की मांग की है। यह मामला बॉबी पंवार, कार्तिक उपाध्याय, नितिन दत्त, भूपेंद्र कोरोंगा और राम कंडवाल से जुड़ा हुआ है।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में बागेश्वर में हुए घटनाक्रम के दौरान इन युवाओं की गिरफ्तारी हुई थी। उस समय बागेश्वर विधानसभा उपचुनाव भी राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में था और पूरे प्रदेश में इस प्रकरण को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई थी। गिरफ्तारी के बाद मामला न्यायालय पहुंचा, जहां 25 जुलाई 2024 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने संबंधित आपराधिक कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया था।
हाईकोर्ट ने उस समय राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर जवाबी शपथपत्र दाखिल करने तथा आवेदकों को उसके बाद चार सप्ताह में प्रत्युत्तर दाखिल करने का समय दिया था। इसके साथ ही बागेश्वर न्यायालय में लंबित आपराधिक कार्यवाही पर अगले आदेश तक रोक लगा दी गई थी।
अब जून 2026 में राज्य सरकार ने न्यायालय में दाखिल अपने आवेदन में कहा है कि लगभग दो वर्षों से मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी है। सरकार का तर्क है कि लंबे समय से स्थगन आदेश प्रभावी रहने के कारण आपराधिक वाद संख्या 162/2024 की सुनवाई प्रभावित हुई है तथा न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो रही है। इसी आधार पर सरकार ने स्टे समाप्त कर मुकदमे की सुनवाई पुनः प्रारंभ करने की मांग की है।
उल्लेखनीय है कि मूल याचिका की सुनवाई के दौरान आवेदकों की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया था कि वे उत्तराखंड में बेरोजगार युवाओं के अधिकारों, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक मामलों की जांच और रोजगार से जुड़े मुद्दों को उठा रहे थे। उनका दावा था कि उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण और आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से की गई है।
करीब दो वर्ष बाद सरकार द्वारा स्टे हटाने की मांग किए जाने से यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बागेश्वर उपचुनाव के दौरान सुर्खियों में आया यह प्रकरण केवल एक आपराधिक मुकदमे का विषय नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड में युवाओं के आंदोलनों, रोजगार और भर्ती पारदर्शिता से जुड़े विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है।
अब सभी की निगाहें उत्तराखंड उच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि स्थगन आदेश जारी रहेगा या मुकदमे की कार्यवाही दोबारा शुरू होगी।
