जन्मदिन विशेष: उत्तराखंड आंदोलन की बुलंद आवाज़ काशी सिंह ऐरी – जिन्होंने पहाड़ की पहचान को राजनीतिक स्वर दिया



उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका उल्लेख किए बिना इस संघर्ष की कहानी अधूरी मानी जाती है। ऐसे ही प्रमुख नामों में से एक हैं काशी सिंह ऐरी। उन्होंने न केवल अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को राजनीतिक मंच प्रदान किया, बल्कि दशकों तक पहाड़ की समस्याओं, पलायन, बेरोजगारी, जल-जंगल-जमीन और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों को लगातार उठाया।

1 जून 1953 को पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र के पंथागांव में जन्मे काशी सिंह ऐरी का जीवन संघर्ष, शिक्षा, सामाजिक चेतना और जनआंदोलन का अनूठा उदाहरण है। उनके पिता का नाम केहर सिंह तथा माता का नाम सुनीता देवी था। प्रारंभिक शिक्षा बलुवाकोट क्षेत्र में प्राप्त करने के बाद उन्होंने नारायण नगर, डीडीहाट से इंटरमीडिएट किया। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए कुमाऊँ विश्वविद्यालय का रुख किया और एम.एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम.ए. तथा एलएलबी की उपाधियां प्राप्त कीं। छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्व क्षमता दिखाई देने लगी थी और वे छात्र राजनीति में सक्रिय रहे।

उत्तराखंड आंदोलन का राजनीतिक चेहरा

सत्तर के दशक के अंत तक उत्तराखंड क्षेत्र में अलग राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी थी। पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, प्रशासनिक उपेक्षा और विकास की कमी को देखते हुए क्षेत्रीय राजनीतिक मंच की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में 25 जुलाई 1979 को काशी सिंह ऐरी, विपिन चंद्र त्रिपाठी, प्रो. देवीदत्त पंत और इंद्रमणि बडोनी जैसे नेताओं ने मिलकर उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की स्थापना की। यह दल आगे चलकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक आधार बना।

काशी सिंह ऐरी उन नेताओं में रहे जिन्होंने गांव-गांव जाकर अलग राज्य की आवश्यकता को समझाया और आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान वे लगातार अग्रिम पंक्ति में सक्रिय रहे और पहाड़ की पहचान, संसाधनों तथा अधिकारों की आवाज़ बने।

चार बार विधायक बनने का गौरव

काशी सिंह ऐरी का राजनीतिक सफर केवल आंदोलन तक सीमित नहीं रहा। वे डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए तीन बार विधायक चुने गए। वर्ष 1985, 1989 और 1993 में उन्होंने जनता का विश्वास हासिल किया। बाद में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में नवगठित उत्तराखंड विधानसभा के प्रथम कार्यकाल में कनालीछीना विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। इस प्रकार वे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों विधानसभाओं के सदस्य रहे।

पहाड़ के मुद्दों पर लगातार मुखर

राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद काशी सिंह ऐरी ने पहाड़ के मूल मुद्दों को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने लगातार पलायन, बेरोजगारी, गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, मूल निवास, भू-कानून और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास जैसे विषयों को उठाया। हाल के वर्षों में भी वे आपदा प्रभावित गांवों के पुनर्वास और पर्वतीय क्षेत्रों के संरक्षण की मांग को लेकर सक्रिय रहे हैं।

सादगी और संघर्ष की पहचान

उत्तराखंड की राजनीति में काशी सिंह ऐरी को सादगी, स्पष्टवादिता और संघर्षशील नेतृत्व के लिए जाना जाता है। वे उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं माना बल्कि उसे जनहित और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई का मंच बनाया।

आज भी उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े हजारों कार्यकर्ता उन्हें आंदोलन की जीवित विरासत मानते हैं। भले ही उत्तराखंड क्रांति दल का राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा न रहा हो, लेकिन राज्य निर्माण के इतिहास में काशी सिंह ऐरी का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

निष्कर्ष

अपने 73वें जन्मदिवस पर काशी सिंह ऐरी केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड आंदोलन की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में याद किए जाते हैं जिसने पहाड़ की पहचान और अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। उनका जीवन नई पीढ़ी को यह संदेश देता है कि जनसरोकारों से जुड़ी राजनीति ही समाज में स्थायी परिवर्तन ला सकती है।

उत्तराखंड की राजनीतिक और सामाजिक चेतना के इतिहास में काशी सिंह ऐरी का नाम सदैव सम्मान के साथ लिया जाएगा।

You missed

error: Content is protected !!