लालकुआँ/नैनीताल।
बिन्दुखत्ता को तत्काल प्रभाव से राजस्व ग्राम घोषित करने और वर्षों से बसे प्रत्येक परिवार को व्यक्तिगत भूमिधरी अधिकार देने की मांग को लेकर आयोजित जनसभा ऐतिहासिक जनसैलाब में बदल गई। मंच से नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “दो सौ वर्षों से चल रहा संघर्ष अब अंतिम लड़ाई में बदल चुका है।”
उन्होंने कहा कि वर्ष 2006 में केंद्र सरकार द्वारा पारित अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम का उद्देश्य स्पष्ट था—पीढ़ियों से वनभूमि पर बसे लोगों को व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकार प्रदान करना, जिनमें राजस्व ग्राम का दर्जा भी शामिल है। लेकिन कानून लागू होने के दो दशक बाद भी बिन्दुखत्ता के निवासियों को उनका वैधानिक अधिकार नहीं मिलना गंभीर प्रशासनिक विफलता है।
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि ग्राम और ब्लॉक स्तरीय समितियों की सकारात्मक संस्तुति के बावजूद फाइलों को जानबूझकर रोका गया। उन्होंने कहा कि नैनीताल के जिलाधिकारी को वनाधिकार कानून के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्वयं राजस्व ग्राम की घोषणा करनी चाहिए थी, लेकिन फाइल शासन को भेजकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। “यह सिर्फ शिथिलता नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों को दबाने की मानसिकता है,” उन्होंने कहा।
उन्होंने यह भी कहा कि बिन्दुखत्ता के स्थानीय निवासी—जिनमें बड़ी संख्या पूर्व सैनिकों की है—आज भी भूमिधरी अधिकार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। “क्या दो सौ साल का संघर्ष भी सरकार को दिखाई नहीं देता?” उन्होंने सवाल उठाया।
यशपाल आर्य ने कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को विधानसभा में कई बार उठाया, लेकिन सरकार ने हर बार टालमटोल की राजनीति की। तराई से लेकर पर्वतीय जिलों तक वनाधिकार से जुड़े हजारों प्रकरण लंबित हैं। यदि शीघ्र न्यायपूर्ण निर्णय नहीं लिया गया तो व्यापक जनांदोलन अपरिहार्य होगा।
जनसभा में मौजूद लोगों ने एक स्वर में बिन्दुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने और प्रत्येक परिवार को भूमिधरी अधिकार देने की मांग दोहराई। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि अब यह संघर्ष निर्णायक मोड़ पर है और यदि सरकार ने शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाया तो आंदोलन और उग्र होगा
