उत्तराखंड जवाब चाहता है!
झारखंड के एक कथित हिस्ट्रीशीटर विक्रम को उत्तराखंड के बाजपुर क्षेत्र में स्टोन क्रेशर का लाइसेंस मिलने का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किन परिस्थितियों में और किस स्तर की जांच के बाद यह लाइसेंस जारी किया गया?
🔎 मुख्य सवाल
क्या लाइसेंस जारी करने से पहले पुलिस वेरिफिकेशन हुआ था?
क्या आवेदक के आपराधिक रिकॉर्ड की जांच की गई?
किस विभाग ने अनुमति दी और क्या पर्यावरणीय मानकों का पालन हुआ?
क्या स्थानीय प्रशासन को आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी थी?
🏛️ नियम क्या कहते हैं?
स्टोन क्रेशर का लाइसेंस देने से पहले आमतौर पर:
जिला प्रशासन की संस्तुति
खनन विभाग की अनुमति
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी
पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट
अनिवार्य मानी जाती है।
यदि इन प्रक्रियाओं में किसी भी स्तर पर चूक हुई है तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानी जाएगी।
🗣️ स्थानीय लोगों में नाराज़गी
बाजपुर क्षेत्र के कुछ सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों का कहना है कि “यदि किसी बाहरी राज्य के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को इतनी आसानी से लाइसेंस मिल सकता है, तो यह पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।”
⚖️ अब क्या?
मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। विपक्षी दलों ने भी सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है कि—
“क्या नियमों को ताक पर रखकर लाइसेंस जारी किया गया?”
📢 उत्तराखंड एक्सपोज़ की मांग
पूरे लाइसेंस प्रक्रिया की सार्वजनिक जांच
संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो
भविष्य में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की सख्त स्क्रीनिंग
