पुलिस-प्रशासन और भाजपा की मिलीभगत उजागर, सरकारी कार्यक्रम में कानून के रक्षक नहीं – राजनीतिक प्रचारक की भूमिका में दिखे थानाध्यक्ष
सल्ट, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
उत्तराखंड के सल्ट क्षेत्र में पुलिस की वर्दी अब निष्पक्षता छोड़कर भाजपा की खुली चापलूसी पर उतर आई है। सल्ट के प्रभारी थानाध्यक्ष कश्मीर सिंह का एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जिसने पुलिस की गरिमा और कानून व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बीते मंगलवार को भाजपा विधायक महेश जीना द्वारा प्राथमिक विद्यालय नैकणा के लोकार्पण और राजकीय पॉलिटेक्निक भवन के भूमि पूजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। यह कार्यक्रम पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंगा हुआ था। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इस कार्यक्रम में सल्ट के प्रभारी थानाध्यक्ष कश्मीर सिंह न केवल मौजूद रहे, बल्कि सभी प्रशासनिक मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए भाजपा नेताओं के साथ मंच पर आसीन हो गए।
खाकी वर्दी या भाजपा का झंडा?
थानाध्यक्ष महोदय ने जिस तरह मंच साझा किया, वह किसी सरकारी अधिकारी की तरह नहीं, बल्कि भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता की तरह था। हद तो तब हो गई जब उन्हें मंच पर शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया और वह भाजपा पदाधिकारियों के बीच कुर्सी पर विराजमान होकर विधायक के भाषण का आनंद लेते रहे।
भूमि पूजन के शिलापट्ट पर भाजपा नेताओं के साथ फोटो खिंचवाना, मंच पर बैठना, सम्मान ग्रहण करना – यह सब यह साबित करता है कि सल्ट पुलिस की निष्पक्षता अब सत्ता की कठपुतली बन चुकी है।
कानून व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल
पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना, अपराध पर नियंत्रण करना और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना है – न कि सत्ताधारी दल के कार्यक्रमों में राजनीतिक कार्यकर्ता की भूमिका निभाना।
ऐसे दृश्य साफ दिखाते हैं कि:
• सल्ट में पुलिस और भाजपा के बीच खुली सांठगांठ चल रही है
• प्रशासनिक तंत्र पर सत्ताधारी दल का कब्जा है
• पुलिस का राजनीतिकरण चरम पर पहुँच चुका है
• जनता के विश्वास के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है
जब पुलिस अधिकारी किसी राजनीतिक दल के मंच पर बैठकर उसका महिमामंडन करते नजर आते हैं, तो आम जनता और विपक्ष के मन में स्वाभाविक रूप से यह धारणा बनती है कि पुलिस निष्पक्ष नहीं, बल्कि सत्ता के इशारों पर काम कर रही है।
लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत
लोकतंत्र में पुलिस की जवाबदेही जनता के प्रति होती है, किसी पार्टी के प्रति नहीं। लेकिन सल्ट में जो दृश्य देखने को मिला, वह पुलिस-प्रशासन की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। इससे पुलिस और जनता के बीच विश्वास की डोर कमजोर होती है और कानून व्यवस्था मजाक बनकर रह जाती है।
अब सबसे बड़ा सवाल –
• क्या यह आचरण पुलिस सेवा नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है?
• क्या एक थानाध्यक्ष का राजनीतिक मंच पर बैठना जायज है?
• क्या पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इस पर संज्ञान लेंगे?
• क्या थानाध्यक्ष कश्मीर सिंह पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होगी?
अब देखना यह होगा कि पुलिस के उच्च अधिकारी इस गंभीर मामले पर क्या कदम उठाते हैं। या फिर यह मान लिया जाए कि उत्तराखंड पुलिस भी पूरी तरह भाजपा की राजनीतिक शाखा बन चुकी है?
